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Dhyan - ध्यान

 

जगद्गुरु आचार्य श्री १०८ कृष्णमणिजी महाराज

 

 

ध्यान क्या है और वह किस प्रकार करना चाहिए इस विषयमें अनेक महानुभावोंके भिन्न-भिन्न मत हैं । कोई मनकी एकाग्रताको ध्यान कहते हैं तो कोई मनकी समग्रताको ध्यान कहते हैं । कुछ महानुभाव विचारशून्य मनस्थितिको ध्यान कहते हैं । योग शास्त्रमें इसको योगका एक साधन मान कर चित्तकी वृत्तियोंको भौतिक विषयों अथवा वस्तुओंसे हटाकर परमात्माकी ओर निरन्तर लगानेको ध्यान कहा है ।
 
ध्यान योगका अन्तरंग साधन है । योगका तात्पर्य है 'मिलन' । आत्मा और परमात्माके मिलनका अनुभव होना ही योग है । चित्त कलुषित होनेसे उसकी वृत्तियां चंचल होती हैं और भौतिक पदार्थोंकी ओर दौड़ती रहती हैं जिसके कारण किसी न किसी प्रकारके दुःखका अनुभव होता रहता है । ऐसेमें विषयोंकी ओर उन्मुख वृत्तियोंको रोक कर परमात्माकी ओर लगाने पर ही योगका अनुभव हो सकता हैं । इसलिए महर्षि पाताञ्जलिने चित्तवृत्तियोंके निरोधको योग कहा है । यथा,
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः (योग दर्शन १/२)
चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर आत्माको स्वयंका अनुभव होगा और वह स्वयंको द्रष्टाके रूपमें समझने लगेगी । इसीलिए महर्षिने कहा,
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् । (योगदर्शन १/३)
महामति श्री प्राणनाथजी कहते हैं, हे साधको ! तुम सर्वप्रथम स्वयंको पहचानो । स्वयंको पहचाने बिना परमात्माकी पहचान कैसे होगी ? यथा,
पेहेले आप पहेचानो रे साधो, पेहेले आप पेहेचानो ।
बिना आप चीन्हे पारब्रह्म को, कौन कहे मैं जान्यो ।।
(किरन्तन १/१)
 
जन्म जन्मान्तरके पाप-पुण्य कर्मोंके संस्कार चित्तमें अंकित होनेसे प्रायः मनुष्यका चित्त कलुषित रहता है । ऐसे चित्तकी वृत्तियाँ चलायमान होती हैं । भौतिक संस्कारोंके कारण कलुषित हुए चित्तकी वृत्तियाँ भी भौतिक पदार्थोंकी ओर ही आकृष्ट होती हैं जिससे चित्त और भी मलिन हो जाता हैं । जिस प्रकार हिलते हुए गन्दे जलमें अपना प्रतिविम्ब नहिवत् दिखाई देता है उसी प्रकार चलायमान वृत्तिवाले मलिन चित्तके कारण आत्माका स्वरूप भी ज्ञात नहीं हो सकता है । इसलिए सर्वप्रथम चित्तको शुद्ध करना होगा तदनन्तर उसकी वृत्तियोंको स्थिर परमात्माकी ओर लगानी होगी । तभी आत्मा और परमात्माका अनुभव होगा ।
 
महर्षि पतञ्जलिने मलिन चित्तवाले लोगोंके लिए चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय अभ्यास और वैराग्य बताया और उनकी विस्तृत चर्चा भी की । क्योंकि साधनाओंका मूल उदेश्य ही चित्तके मल (विकारों) को दूर करना है । मनुष्यका स्वभाव ऐसा बन गया है कि वह निर्मलताका ढोंग रचता है अर्थात् अन्तःकरणमें स्थित विकारोंको छिपाकर रखना चाहता है और बाहरसे शुद्धताका दिखावा करता है । ऐसे लोगोंके लिए महामति श्री प्राणनाथजीने कहा है,
अन्दर नहीं निरमल, फेर फेर नहावे बाहेर ।
कर देखाई कोट बेर, तोहे ना मिलो करतार ।।
तोलों ना पिउ पाइए, जोलों न साधे दिल ।।
                                                         (किरन्तन­­ १३२/१,२)
 
जब तक अन्दरकी शुद्धि नहीं होगी और चित्तवृत्तिको परमात्माकी ओर नहीं लगाओगे तब तक भले ही तुम बाहरी पवित्रताके अनेक दिखावे क्यों न करो किन्तु तुम्हें परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी । तुम जिस प्रकार बाहरसे शुद्ध, पवित्र एवं भले होनेका दिखावा करते हो यदि सचमूच अन्दरसे शुद्ध, पवित्र एवं भले बन जाओगे तब तुम्हें परमात्माकी अनुभूतिके लिए क्षणमात्रका भी समय नहीं लगेगा, तुम सदैव परमात्मामें ही रमण करते रहोगे । यथा,
जैसा बाहेर होत है, जो होवे ऐसा दिल ।
तो अधखिन पिउ न्यारा नहीं, माहें रहे हिलमिल ।।
                                                              (किरन्तन १३२/४)
 
महर्षि पतञ्जलिने पदार्थोंसे प्राप्त सुखोंका उपभोग एवं स्वर्गादि लोकोंके सुखोंका उपभोग करनेकी चाहना रहित होनेको अपर वैराग्य एवं परमात्माका समझकर अथवा परमात्माकी ओर आकृष्ट होकर प्रकृतिजन्य गुणोंकी ओर आकृष्ट न होनेको पर वैराग्य कहा है । वास्तवमें वैराग्यका तात्पर्य है कि भौतिक वस्तुओंके प्रति अनुरागका समाप्त होना एवं परमात्माके प्रति रागका उदय होना । इसीको विगत राग (भौतिक पदार्थोसे राग हट जाना) एवं विशिष्ट राग (परमात्माकी ओर राग होना) कहा गया है । विभिन्न साधनाओंके निरन्तर अभ्यास और वैराग्यके द्वारा सामान्य व्यक्ति भी चित्तकी वृत्तियोंको भौतिक जगतसे हटाकर परमात्माकी ओर लगा सकता है । ऐसे लोगोंके लिए चित्तवृत्तिनिरोधका उपाय अभ्यास और वैराग्य कहा गया है । यथा,
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः । (योगदर्शनः १/२)
अभ्यास और वैराग्यसे उसका निरोध हो सकता है ।
 
किन्तु जन्म-जन्मान्तरके शुभ संस्कारोंके द्वारा जिनका अन्तःकरण निर्मल हो चुका होता है ऐसे श्रेष्ठ साधकोंको दीर्घकालीन साधनाकी ओर जानेकी आवश्यकता नहीं रहती है । उनके लिए अति सरल साधना है 'प्रेम' महर्षि पतञ्जलिने पर वैराग्यके द्वारा उसका संकेत किया है । ऐसे व्यक्ति परमात्माके प्रति स्वयंको समर्पित कर, परमात्माकी शरणमें रह कर अपनी चित्तवृत्तियोंको भौतिक आकर्षणोंकी ओर जानेसे रोक सकते हैं और उनको परमात्माकी ओर लगाकर परमात्माके प्रेममें मस्त रह सकते हैं । ऐसे श्रेष्ठ साधकोंके लिए चित्तवृत्तिनिरोधका विशेष उपाय बतलाते हुए महर्षि कहते हैं,
ईश्वरप्राणिधानाद्वा (योग दर्शन १/२३)
उच्च कोटिके साधक परमात्माके प्रति समर्पित होकर अपनी चित्तवृत्तिका निरोध कर सकते हैं ।
 
विभिन्न शास्त्रोंमें साधकोंकी योग्यताके आधार पर साधनाके मार्ग दो प्रकारके बतलाये हैं । वे हैं, (१) पिपीलिका मार्ग और (२) विहंगम मार्ग । इनमें पिपीलिका मार्ग वह है जिसके द्वारा दीर्घकाल पर्यन्त निरन्तर साधना करता हुआ साधक परमात्माकी अनुभूति कर सकता है । इस मार्गमें विघ्नबाधायें भी अनेक आती हैं और किसी कारणवश साधनामें विपेक्ष पड़ा तो जन्म-जन्मान्तर पर्यन्त भी प्रयत्न करना पड़ सकता है । तथापि सभी साधकोंको सफलता प्राप्त नहीं होती है । क्योंकि अनेक परिस्थितियोंका सामना करता हुआ साधक कभी न कभी पथभ्रष्ट हो सकता है । इसीलिए ऐसे मार्गको पिपीलिका मार्ग अर्थात् चीटियोंका-सा मार्ग कहा है ।
 
दूसरा मार्ग है विहंगम मार्ग अथवा पक्षियोंका-सा मार्ग । जिस प्रकार पक्षी अपने पंखोंकी सहायतासे उड़कर लम्बी दूरी भी तत्काल तय कर लेता है जबकि चीटियोंको उतनी दूरी तय करनेमें अनेकों जन्म पर्यन्त निरन्तर यात्रा करनी पड़ सकती है, तथापि अनेकों विघ्नबाधाओंके चलते सभी चीटियाँ गन्तव्य पर्यन्त पहुँच नहीं सकती है, इसी प्रकार पिपीलिका मार्गसे चलनेवाले सभी साधक परमात्मा तक नहीं पहुँच सकते हैं । श्रीमद्भगवद्गीतामें श्री कृष्णजीने भी यही बात कही है,
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चित् मां वेत्ति तत्तवतः ।।
                                                                   (गीता ७/३)
 
एक तो हजारों मनुष्योंमें कोई एक परमात्म-प्राप्तिकी साधनामें लगता है । इस प्रकार साधना मार्गमें चलने वालोंमें भी हजारोंमेंसे कोई एक ही मुझे यथार्थरूपसे जान सकता हैं ।
महामति श्री प्राणनाथजीने उक्त दोनों प्रकारके मार्गोंका निरूपण करते हुए कहा है,
पन्थ होवे कोटि कलप, प्रेम पहुँचावे मिने पलक ।।
                                                           (परिक्रमा १/५३)
 
अन्य साधनाओं (पिपीलिका मार्ग) के द्वारा परमात्मा तक पहुँचनेमें कोटि कल्प व्यतीत हो सकते हैं किन्तु प्रेमके द्वारा क्षणमात्रमें पहुँचा जा सकता हैं । क्योंकि परमात्मा तो दूर ही नहीं हैं । हम अज्ञानके आवरणके कारण उनका अनुभव नहीं कर पा रहे होते हैं और उनको दूर समझते हैं । हमारे अन्तःकरण पर अज्ञानका आवरण छाया हुआ है । तभी महामति कहते हैं,
तू आप ही न्यारी होत है, पियु नहीं तुझ से दूर ।
परदा तूं ही करत है, अंतर न आडे नूर ।।
                                                (किरन्तन १३२/५)
 
हे आत्मा तू स्वयं ही परमात्माकी ओर न देख कर संसारकी ओर देख रही हो ओर स्वयंको परमात्मासे दूर मान रही हो । वास्तवमें प्रियतम परमात्मा तुझसे दूर नहीं हैं । तुने अज्ञानका आवरण ओढ़ लिया है । उसे दूर करोगी तो तुझे अनुभव होगा कि तेरे और परमात्माके बीच कोई दूरी नहीं है ।
 
इसीलिए महामति विहंगम मार्गका उपदेश देते हैं । जैसे पक्षी अपने पंखोंकी सहयतासे उड़ान भरता है उसी प्रकार हे साधक ! तुम भी ज्ञान और प्रेमरूपी पंखोंकी सहायतासे उड़ान भरनेका प्रयत्न करो । उन्होंने तारतम ज्ञान एवं प्रेमलक्षणा भक्तिका एक साथ उपदेश इसीलिए दिया है । जब तुम्हारा हृदय ज्ञान और प्रेमसे ओतप्रोत होगा तब तुम्हें उडान भरनेकी भी आवश्यकता नहीं पडें़गी । तुम स्वयंको श्रीराजजीके साथ ही रमण करते हुए पाओगे । यथा,
ओ खेले प्रेमें पार पिया सों, देखनको तन सागर मांहि ।
                                                                (किरन्तन)
 
ऐसे साधक शरीरसे तो दुनियाँमें रहते हैं और लोक व्यवहारका काम भी करते हैं किन्तु आत्मभावसे नित्य निरन्तर पूर्णब्रह्म परमात्मा श्री राजजीके साथ प्रेमपूर्वक खेलते रहते हैं ।
महर्षि पतञ्जलिने धारणा, ध्यान और समाधिको योगके अन्तरंग साधन माना है । उनका कहना है कि चित्तवृत्तिको एक मात्र लक्ष्य परमात्मामें ठहराना धारणा है, उसको निरन्तरता प्रदान करना ध्यान है और उस समय चित्तका अपना पन मिटकर मात्र ध्येय अर्थात् परमात्माका अनुभव होना समाधि है । यथा,
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ।
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।
                                                       (योगसूत्र ३/१,२,३)
 
इससे यह स्पष्ट होता है कि परमात्माकी अनूभूतिके लिए धारणा, ध्यान और समाधि अंतरंग साधन हैं । इन तीनोंको भिन्न-भिन्न नहीं अपितु एक ही साधनकी तीन अवस्थाएँ समझनी चाहिए । दूसरे शब्दोंमें कहें तो ध्यानकी आरंभिक अवस्था धारणा है तो अन्तिम अवस्था (अथवा सफलता) समाधि है । इस प्रकार समाधि ध्यानसे भिन्न नहीं अपितु ध्यानकी उत्तम अवस्था है । इसलिए ध्यान कहनेसे धारणा ध्यान एवं समाधि तीनों ही आ जाते हैं । इसीलिए कहा गया है कि परमात्माकी अनुभूतिके लिए अति उत्तम साधन ध्यान है क्योंकि ध्यानके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंको परमात्मामें स्थिर कर देहात्मबुुद्धि, देहाध्यास अथवा मैं पनको समर्पित करने पर परमात्माकी अनुभूति होती है । यही कारण है कि उच्च कोटिके साधकों (जिनका अन्तःकरण जन्मजन्मान्तरकी साधना एवं सत्संग द्वारा निर्मल हो चुका हो) के लिए अन्य साधनाओंकी अपेक्षा परमात्माकी ओर समर्पित होने को ही श्रेयकर माना गया है । क्योंकि समर्पणसे ही समाधि सिद्ध होगी । यथा,
समाधिसिद्धिः ईश्वरप्रणिधानात् । (योगसूत्र २/४५)
 
प्रेमके बिना समर्पण संभव नहीं है । इसलिए महामति श्री प्राणनाथजीने प्रेमको सहज साधन कहा है । जिसके हृदयमें प्रेम प्रकट होता है उसके लिए यह संसार स्वप्नवत् लगेगा । वह तो निरन्तर समाधिमें ही रहता है अथवा वह जीवमुक्त हो जाता है । यथा,
उत्पन्न प्रेम पारब्रह्म संग, वा को सुपन होय गयो संसार ।।
                                                                      (किरन्तन)
 
ऐसे प्रेमी समत्वभावको प्राप्त हुए होते हैं । गीतामें समत्त्वको भी योग कहा है, समत्त्वं योग उच्यते (गीता) । उनका ध्यान लौकिक वस्तुओंसे हटकर परमात्माकी ओर ही लगा रहता है । संसारिक दुःखदायी वस्तुओंसे बने हुए सम्बन्धके विच्छेदको भी गीतामें योग कहा है,
तद्विद्याद् दुःखसंयोगवियोग योगसंज्ञितम् ।
 
                                      (गीता)
 
क्योंकि भौतिक वस्तुओंसे सम्बन्ध छूटने पर ही परमात्माके साथके नित्य सम्बन्धका अनुभव होगा । प्रेमके द्वारा यह अनुभव शीघ्र होता है । इसलिए प्रेमका महत्त्व सर्वातिशय बताया है । यहाँ तक कि प्रेमको परमात्माका ही स्वरूप मान है । महामति कहते हैं,
प्रेम ब्रह्म दोउ एक हैं ।
                                  (परिक्रमा २/....)
 
प्रेम सारे बन्धनोंको तोड़ देता है और सारे बन्द द्वारोंको खोल देता है । यथा,
प्रेम खोल देवे सब द्वार, पारके पार पियाके पार ।
                            (परिक्रमा ३)
 
दूराचारी व्यक्ति भी यदि अपने दुष्कृत्योंको छोड़कर परमात्माके प्रेममें पागल हो जाता है तो वह सारे पापोंसे मुक्त होकर परमात्माका अनुभव कर सकता है । प्रेममें जितना समर्थ्य है उतना अन्य किसीमें नहीं है । परमात्माके प्रेममें डूवा हुआ व्यक्ति जगतके भयोंसे मुक्त होकर निर्भय हो जाता है । महामति कहते हैं,
वाको आग खाग वाघ नाग न डारावे, गुण अंग इद्रीयोसे होत रहीत ।
डर सकल सांमी इनसे डरपत, या विध पाइए प्रेम परतीत ।।
                                                              (किरन्तन ९/३)
 
अनन्य प्रेमी व्यक्ति गुण अंग इन्द्रियोंसे ऊपर उठा हुआ होता है इसलिए उसको अग्नि, शस्त्र, हिंस्रक प्राणी वाघ, नाग आदि भी भयभीत नहीं कर सकते अपितु उससे प्रेम करने लगते हैं । स्वयं भय ऐसे व्यक्तिसे भयभीत होता है । हृदयमें अहिंसा भाव स्थिर होने पर भी ऐसेे व्यक्तिके समीपमें अन्य लोगोंका बैर भाव दूर होता है । कहा भी है,
अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः । (योगदर्शन २/३५)
 
प्राचीन समयमें ऋषियोंके आश्रमोंके समीप वाघ एवं हरिण साथ साथ रहते थे । यह अहिंसा वृत्तिका ही परिणाम था ।
 
उपर्युक्त समग्र कथनोंसे यह स्पष्ट होता है कि परमात्माकी अनुभूतिके लिए ध्यान मुख्य साधन है । इसमें प्रेमकी मात्रा जितनी अधिक होगी उतनी ही शीघ्र और स्पष्ट अनुभूति होगी । निजानन्दाचार्य श्री देवचन्द्रजी महाराजकी भांति निश्छल प्रेम हो तो पूर्णब्रह्म परमात्माके प्रत्यक्ष दर्शन भी हो सकते हैं । इसीलिए कहा है कि योगीजन वर्षोंकी साधनासे पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णकी छविको एक वार हृदयमें स्थित करना चाहते हैं जबकी प्रेमी गोपियाँ श्री कृष्णके प्रेममें पागल बनी हुई निरन्तर उनके साथ खेलती रहती हैं । गोपियोंकी सहज साधना प्रेम है । हमारा हृदय भी प्रेमसे भर जाय तो आज भी ऐसा अनुभव कर सकते हैं । इसके लिए शुरुआत ध्यानके द्वारा की जाती है ।
 
इस प्रकार ध्यानका महत्त्व जानने पर अब हमें यह भी जानना है कि ध्यान कैसे किया जाय अथवा ध्यानकी विधि क्या है ? इसके लिए हमें यह जानना आवश्यक है कि लौकिक साधनाओंकी भांति ध्यानकी कोई निश्चित विधि नहीं होती है । साधनाओंकी सारी विधियाँ अन्तःकरणके मलको दूर करनेके लिए हैं । विधि निषेधका सम्बन्ध द्वन्द्वोंके साथ होता है । निर्द्वन्द्व एवं नित्यसत्त्वस्थ होने पर ही ध्यान लगता है । सामान्यजन विचारशून्य स्थितिको ही ध्यान लगना समझते हैं वह तो प्रत्याहारका एक रूप भी हो सकता है और समाधिका विघ्न भी हो सकता है । यह तो एक पड़ाव मात्र है मंजिल नहीं । मंजिल तो परमात्मा ही हो सकते हैं । क्योंकि घण्टों तक ध्यान लगाने वाले व्यक्तियोंसे उनका अनुभव पूछा जाय कि क्या उन्हें उस समय परमात्माका अनुभव हो रहा था ? तब वे यही कहेंगे कि परमात्माका अनुभव तो नहीं हो रहा था किन्तु एक अलग प्रकारके आनन्दका अनुभव हो रहा था । इससे यह ज्ञात होता है कि वह परमात्माका अनुभव नहीं अपितु विचारशून्य अवस्था थी । कभी कभी ऐसे साधक शरीरके भिन्न-भिन्न चक्रोंका चिन्तन करते हुए उन चक्रोंके (विशेष कर आज्ञा चक्रके) सक्रिय होने पर इस ब्रह्माण्डके अन्तर्गत स्थित विभिन्न दृश्योंको देख सकते हैं । इस प्रकार आज्ञाचक्र खुलने पर अतीन्द्रिय दृश्य दिखाई देते हैं । कभी किसीको कुछ सिद्धियां भी प्राप्त हो सकती हैं । इतना होने परभी जो कुछ प्राप्त हुआ वह यथार्थमें लौकिक सुख ही तो है । परमात्मा तो इन सबसे भिन्न हैं । उनका अनुभव प्रेमसे ही होगा इसलिए साधकको छल कपट, रागद्वेष आदि द्वन्द्वोंको छोड़ कर हृदयमें प्रेम भरना चाहिए । इस प्रकार आगे बढ़ने पर कभी न कभी किसी न किसी प्रकारसे थोड़ा अंशमें भी परमात्मका अनुभव अवश्य होगा ।
प्रेमका स्वरूप अनिर्वचनीय है । ब्रह्मात्माएँ अपने प्रियतम परमात्माके प्रेममें स्वयंको समर्पित करती हैं और द्वन्द्वोंसे मुक्त होकर पूर्णब्रह्म परमत्मा अनादि अक्षरातीत श्रीराजजीका अनुभव करती हैं । इसलिए ऐसा ध्यान विधि- निषेध रहित माना जाता है । कहा भी है,
द्वान्द्वातीते पथि विचरतां को विधिः को निषेधः ।
 
ध्यानके इस द्वान्द्वातीत मार्ग पर चलनेवालोंके लिए क्या तो विधि होगी और क्या ही निषेध होगा । इसीलिए शंकराचार्यजीने भी ध्यानके विषयमें कहा,
लक्ष्ये ब्रह्मणि मानसं दृढतरं संस्थाप्य बाह्येन्द्रियं,
स्वस्थाने विनिवेश्य निश्चलतनुश्चोपेक्ष्य देहस्थितिम् ।
ब्रह्मात्मैक्यमुपेत्य तन्मयतया चाखण्डवृत्त्यानिशं,
ब्रह्मानन्दरसं पिबात्मनि मुदा शून्यैः किमन्यैर्भ्रमैः ।।
                                                           (विवेक चूडामणि ३७९)
 
अपने चित्तको एकमात्र लक्ष्य परमात्मामें दृढतापूर्वक स्थिर कर बाह्य इन्द्रियोंको अन्त्तर्मुख करो और देहकी स्थितिकी ओर ध्यान न देकर मात्र उसे निश्चल रखो । अब तन्मय होकर आत्मा और परमात्माके मिलनका अनुभव करो एवं आत्माके द्वारा अखण्ड रूपसे ब्रह्मानन्द रसका पान करो । हे साधक ! तुम्हें इस जगतकी भ्रमपूर्ण थोथी बातोंसे क्या लेना-देना है ?
 
सचमुच चित्तकी वृत्तियोंको भौतिक पदार्थोंकी और न दौड़ाकर श्री राजजीकी ओर प्रेमपूर्वक दौड़ाने लगेंगे तब कहीं हमारा ध्यान सफल होगा । इसलिए ऐसे ध्यानमें विधि निषेधका कोई विशेष महत्त्व न होते हुए भी प्रेमी सुन्दरसाथ कैसे और कहाँसे ध्यान करना आरंभ करें इसके लिए यहाँ पर संक्षिप्त मार्गदर्शन दिया जाता है ।
 
आप प्रातः ब्रह्म मुहुर्तमें (तीन से छः बजेके मध्य) शौच-स्नान आदिसे निवृत्त होकर पूजाकक्षमें अथवा अन्य शुद्ध स्थान पर एकान्त स्थलमें शुद्ध आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख हो कर बैठें और आँख बन्दकर चित्तवृत्तियोंको अन्यत्र न दौड़ाते हुए प्रेम पूर्वक श्रीराजजीका चिन्तन आरंभ करें । ऐसा मान लें कि श्रीराजश्यामाजी आपके सम्मुख सिंहासन पर विराजमान हैं । आप उनको प्रेम पूर्वक देखनेका प्रयत्न करें । इसके लिए आप श्रीराजश्यामाजीकी फोटोकी सहायता ले सकते हैं । श्री ५ नवतनपुरी धामसे प्रकाशित श्री राज श्यामाजीकी फोटो ध्यानके लिए ही है । आप फोटोको अपने सम्मुख रख कर पहेले खुली आँखोंसे श्री राजश्यामाजीका स्वरूप प्रेम पूर्वक भली भाँति देखें । देखते हुए ऐसा सोचें कि फोटोमें जितनी सुन्दरता है उससे करोडों गुनासे भी अधिक सुन्दर स्वरूप श्रीराजश्यामाजीका है । फिर आँख बन्दकर अन्दरकी दृष्टिसे उस स्वरूपके दर्शन करनेका प्रयत्न करें । इस समय विचारोंको कहीं न दौड़ायें । ऐसा मान लें कि श्रीराजश्यामाजी साक्षात् रूपमें आपके सम्मुख विराजमान हैं और आप प्रेमपूर्वक उनके दर्शन कर रहे हैं । चित्तकी वृत्तियाँ तो यत्र-तत्र कहीं भी दौड़नेका प्रयत्न करेंगी किन्तु आप किसी भी विषयका चिन्तन किए बिना इन वृत्तियोंको दृढ़ता पूर्वक श्रीराजजीकी और ही लगाए रखें । आप जितने प्रेमसे दर्शन करनेका प्रयत्न करेंगे आपको उतना ही अच्छा लगेगा । आधा घण्टेसे लेकर एक घण्टे तक आप प्रतिदिन निश्चित समयमें यह अभ्यास करें । यात्रामें भी निश्चित समयपर ध्यानमें बैठ जायें । ध्यानके लिए एक निश्चित आसन रखें । ध्यानके पश्चात् गर्म दूध अवश्य पीएँ । जिनका ध्यान लग जाता है उनको गर्म दूधमें घी डालकर पीना चाहिए ।
 
अन्तःकरणकी शुद्धताके आधार पर आपको अनुभव होगा । ब्रह्मात्मा होगी और उनका अन्तःकरण शुद्ध होगा अर्थात् हृदयमें छल-कपटकी भावना नहिंवत् होगी तो उनको थोड़े दिनोंके प्रयत्नमें ही अनुभव होने लगेगा । कलश हिन्दुस्थानी ग्रन्थमें सुहागिनियोंके लक्षण बताये गए हैं ऐसी निर्मलहृदया ब्रह्मात्माको तो अति अल्प समयमें ही अलौकिक अनुभव होने लगेगा और थोड़े दिनोंमें तो उन्हें श्री राजश्यामाजीकी अनुभूति ही होने लगेगी और ध्यानमें दर्शन भी होंगे । यह सब प्रेमका आधिक्य और अन्तःकरण (हृदय) की निर्मलता पर निर्भर होगा । ब्रह्मत्माओंके अतिरिक्त अन्य आत्माओंको भी निरन्तर अभ्यास और श्रद्धा एवं विश्वासकी दृढताके आधार पर न्यूनाधिक्य रूपमें अवश्य अनुभव होने लगेगा ।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मत्सरके कारण अन्तःकरण मलिन बना हुआ होता है और चित्तकी वृत्तियाँ अति चञ्चल होती हैं । उनको श्रीराजजीकी ओर लगाना इतना सरल नहीं है । ध्यान करना आरंभ करनेसे पूर्व आप उसी आसनमें बैठकर योगमुद्रा एवं भस्त्रिका तथा अनुलोम-विलोम प्राणायाम तीव्रगतिसे कर सकते हैं । इस अभ्याससे चंचल वृत्तियोंको स्थिरता   प्रदान करनेमें सहायता मिलेगी । इसीलिए थोड़े आसन और लयबद्ध ढंगसे प्राणायाम करना भी सिखना चाहिए । योगमुद्रा भी सही ढंगसे दस मिनट पर्यन्त करेंगे तो उससे भी स्थिरतामें सहायता मिलेगी । आसन, प्राणायाम एवं मुद्राएँ तो सहयता ही कर सकती है । वास्तवमें श्री राजजीका अनुभव तो प्रेमसे ही होगा । इसलिए श्री प्राणनाथजी कहते हैं,
निस दिन ग्रहिए प्रेमसों, श्री युगल स्वरूपके चरण ।
निर्मल होना याहीसों, और धाम वरनन ।।
 
निजानन्दाचार्य श्री देवचन्द्रजी महाराज ध्यानमें सदैव श्री राजजीका अनुभव करते थे और परमधाममें विचरण भी करते थे । उनको सदैव श्रीराजजीके सान्निध्यका अनुभव होता था । उन्होंने ध्यानके लिए ध्यानकक्ष बनाया था । वहाँपर ध्यान करते हुए वे श्रीराजजीके साथकी विभिन्न लीलाओंका नित्य अनुभव एवं दर्शन करते थे । महामति श्री प्राणनाथजीने भी सर्वप्रथम ध्यानमें ही श्रीश्यामाजी, श्रीराजजी एवं ब्रह्मात्माओंके दर्शन किए और रास लालीका अनुभव किया । इसी प्रकार उन्होंने श्रीराजश्यामाजीके स्वरूप, सिनगार, लीलाएँ एवं परमधामके दर्शन किए और उनका वर्णन किया । सद्गुरुने तो श्री यमुनाजीका प्राकट्य भी किया । इसी प्रकार श्री लालदासजी, जुगलदासजी जैसे अनेक ब्रह्ममुनियोंको ध्यानमें श्रीराजश्यामाजी एवं परमधामके दर्शन होते थे । इसी प्रकार कतिपय परवर्ती सन्तोंको भी श्रीराजजीके अनुभव हुए हैं ।
 
श्री कृष्णप्रणामी धर्ममें ध्यानके साथ साथ चितवनीका भी विशेष महत्त्व है । परमधामकी विभिन्न लीलाओंके चिन्तनको चितवनी कहा गया है । श्री कृष्ण प्रणामी धर्मकी अष्टप्रहर सेवा पूजा चितवनी ही है । उसमें भी प्रातःकालीन सेवापूजा परमधाम लीला एवं सायंकालीन सेवापूजा व्रज, रास एवं जागनी लीलाकी चितवनी है । सेवा पूजाका गायन करते हुए उन लीलाओंका प्रेमपूर्वक चिन्तन करेंगे तो उन लीलाओमें स्वयंके सम्मिलित होनेका अनुभव होगा । ध्यान और चितवनीमें सफल सुन्दरसाथकी स्थितिका वर्णन करते हुए महामति श्री प्राणनाथजी कहते हैं,
खाते पीते उठते बैठते, सोवत सुपन जाग्रत ।
दम न छोड़े मासूक सों, जाकी असल हक निसबत ।।
 
ऐसी आत्माएँ खाते हुए, पीते हुए, उठते हुए, बैठते हुए, सोते हुए तथा      जागते हुए सदैव अपने धनीके साथका अनुभव करती हैं । उन्होंने ही यथार्थमें अपने धनीके साथके सम्बन्धकी पहचान की है । सुन्दरसाथजी ! हम ऐसा प्रयत्न अवश्य करें कि जिससे हमारा ध्यान सदैव श्रीराजजीमें बना रहे । भौतिक वस्तुएँ जितनी भी मिलेंगी वास्तवमें वे नश्वर ही रहेंगी । इसलिए श्रीराजजीका ध्यान छोड़कर भौतिक वस्तुओंकी ओर ध्यान लगाना अज्ञानता ही कहलायेगी । अतः एव हम तारतम ज्ञानके द्वारा इस रहस्यको समझ कर प्रेमलक्षणा भक्तिके द्वारा श्रीराजजीके चरणोंमें ध्यान लगाते हुए उनका अनुभव करें । इसीमें जीवनकी सार्थकता है ।