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Bhakti Sadhna - भक्ति साधना

जगद्गुरु आचार्य श्री १०८ कृष्णमणिजी महाराज

 

शरीर, इन्द्रियाँ, मन तथा अन्तकरणकी वृत्तियोंको नियन्त्रित एवं नियमित करनेके लिए साधना बड़ी उपयोगी होती है । साधनाके द्वारा शरीर स्वस्थ रहता है, इन्द्रियाँ नियन्त्रित रहती हैं, मन सहित अन्तःकरणकी वृत्तियाँ शुद्ध होकर एक दिशामें लगनेके लिए योग्य बनती हैं । सामान्यजनोंको यह ख्याल होता है कि साधना सिद्धिके लिए होती है । वास्तवमें साधना सिद्धिके लिए नहीं अपितु शुद्धिके लिए होती है । साधनाके द्वारा अन्तःकरण शुद्ध होते हैं जिससे मनुष्यमें विशिष्ट क्षमता प्राप्त होती है । उसीको लोग सिद्धि कहते हैं और ऐसी ही सिद्धिकी प्राप्तिके लिए साधना करते हैं ।


साधनाका प्रभाव जन्म जन्मान्तर पर्यन्त रहता है इसलिए पूर्व जन्ममें की गई साधनाका फल इस जन्ममें भी प्राप्त होता है । साधनासे संस्कार बनते हैं । निरन्तर साधनाके द्वारा अन्तःकरणमें पड़नेवाली छापको ही संस्कार कहते हैं । अच्छे विचार तथा अच्छे कार्योंसे अच्छे संस्कार बनते हैं और बुरे विचार तथा बुरे कार्योंसे बुरे संस्कार बनते हैं । कितने व्यक्ति बाल्यकालसे ही सद्वृत्तिवाले होते हैं । किसीकी भी पीड़ाको देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है । उनमें परमात्माके प्रति भी स्वाभाविक श्रद्धा होती है । ये सभी लक्षण पूर्वजन्मके सुसंस्कार अर्थात् अच्छी साधनाकी ओर संकेत करते हैं । इसी प्रकार कुछ व्यक्ति बाल्यकालसे ही क्रूर, कपटवृत्तिवाले होते हैं । ऐसी वृत्ति उनके पूर्वजन्मके कुसंस्कारोंकी ओर संकेत करती है । पूर्वजन्मके भले-बुरे संस्कार अन्तःकरणमें अंकित रहते हैं और इस जन्मको भी प्रभावित करते हैं । इसलिए पूर्वजन्मके कुसंस्कारोंको दूर करनेके लिए एवं सुसंस्कारोंको सक्रिय तथा गतिशील बनानेके लिए साधनाकी नितान्त आवश्यकता रहती है । जो व्यक्ति साधनाका महत्त्व समझते हैं वे इसके प्रति उन्मुख होते हैं अन्यथा अनेक व्यक्तियोंको इस विषयमें कुछ भी ज्ञान नहीं होता है जिससे उनको जीवनकी दिशा ही प्राप्त नहीं होती है । इसलिए वे मानव होने पर भी पशुवत् व्यवहार करते हैं । साधनाके महत्त्वको समझनेके लिए सत्संगकी आवश्यकता होती है । सन्त गुरुजनोंके सत्संगके द्वारा मानवको जीवनकी सही दिशा प्राप्त होती है उससे उसकी दशा बदल जाती है ।


उदाहरणके लिए लोहेके एक टुकडे़को लेते हैं । लोहेके टुकड़ेको चुम्बकके साथ एक ही दिशामें घसने(रगड़ने) लगेंगे तो वह भी चुम्बकीय गुण प्राप्त करता है । इस प्रक्रियामें चुम्बकसे लोहेके टुकड़ेमें चुम्बकीय शक्ति नहीं जाती है अपितु चुम्बकके साथ एक दिशामें घर्षण होने पर लोहेके टुकड़ेके अणु-परमाणुओंको एक दिशा प्राप्त होती हैं । शक्ति तो उन्हीं अणुओंमें है किन्तु वे एक दिशामें न होनेसे संगठित नहीं हो पाते हैं । चुम्बकके संसर्गसे उन्हें एकदिशा प्राप्त होती है जिससे उन अणुओंकी शक्ति प्रकट होती है । इस प्रकार एक सामान्य लोहा चुम्बक बन जाता है ।

 

इसी प्रकार मनुष्यके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ, जो चारों दिशाओंमें फिरती रहती हैं, साधनाके द्वारा एक सही दिशा प्राप्त करती हैं । उससे अपार शक्ति प्रकट होती है उसीको लोगोंने सिद्धि कहा है । ऐसी साधना सद्गुरुके मार्गदर्शनमें हो तो व्यक्तिके अन्तःकरणकी वृत्तियोंको परमात्माकी दिशा प्राप्त होती है जिससे व्यक्ति परमात्माके दर्शन तथा अनुभव प्राप्त कर सकता है । इसीको भक्ति साधना कहा है ।
भक्ति साधनाके द्वारा आत्माकी अनुभूति होती है, परमात्माकी अनुभूति होती है और परमधामकी अनुभूति होती है । भक्तिमें समर्पण होता है । समर्पण प्रेमसे ही सम्भव है इसलिए भक्ति साधनाको प्रेम साधना भी कहा है ।

 
प्रेम ऐसी भांत सुधारे, ठौर बैठे पार उतारे ।।
पंथ होवे कोटि कलप, प्रेम पहुँचावे मिने पलक ।।
प्रेम खोल देवे सब द्वार, पारके पार पियाके पार ।।

 

जिन साधकोंको परमात्माकी दिशा प्राप्त नहीं होती है अथवा जो साधक परमात्माको लक्ष्य बनाए बिना ही साधना करते हैं ऐसे साधक अन्तःकरणकी वृत्तयोंके एक दिशामें होनेपर प्राप्त शक्तिको सिद्धि मानकर उसीमें मस्त रहते हैं । वे साधनाके मुख्य उद्देश्यसे विचलित होकर भौतिक लाभ प्राप्त करते हैं । अधिकांश साधकोंको भौतिक लाभमें ही रुचि होती है इसलिए भौतिक लाभ प्राप्त करनेके लिए ही कठोर साधना भी करते हैं । उनकी साधना भी निष्फल नहीं होती है किन्तु जिस साधनाके द्वारा पूर्णब्रह्म परमात्माकी अनुभूति हो सकती हो उससे मात्र भौतिक लाभ प्राप्त कर सन्तुष्ट हो जाना अल्पज्ञता ही मानी जायेगी । इसलिए सच्चे साधकोंको अपनी साधनाका लक्ष्य परमात्मा ही बनाना चाहिए । बाह्य साधनासे भौतिक जगतका लाभ प्राप्त होता है तो प्रेम साधनासे परमात्माकी प्राप्ति होती है । इसीलिए महापुरुषोंने भौतिक साधनाको महत्त्व न देकर प्रेम साधनाका ही महत्त्व समझाया है और उसीके लिए प्रेरणा दी है । प्रेम साधनाके लिए महातमि कहते हैं, अंतःकरणकी शुद्धि होने पर हृदयसे प्रेम प्रकट होता है । प्रेममें इतनी शक्ति होती है कि वह आत्माको इसी शरीरमें रहते हुए ही परमधामका अनुभव करवा सकती हैं । बाह्य साधनाएँ कोटि प्रयत्नोंसे भी परमात्माकी अनुभूति नहीं करवा सकता है जबकि प्रेम साधना क्षणमात्रमें अनुभव करवाती है । इसीलिए इसकी सर्वोपरिता बताई गई है । प्रेम साधना दिलकी साधना है । जबतक दिलकी साधना नहीं होगी तब तक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी । महामति कहते हैं,


तोलों ना पिउ पाइए, जालों न साधे दिल ।


यहाँ पर दिलकी साधनाका तात्पर्य है हृदय पर्यन्त पहुँचना । शरीरमें प्रेम प्रकट होनेका स्थान हृदय है । अन्तःकरणकी अशुद्धि हमें हृदय पर्यन्त पहुँचने नहीं देती है । साधनाके द्वारा जैसे ही अन्तःकरणकी शुद्ध होती है उसी समय हम हृदयके भावको ग्रहण करने योग्य बन जाते हैं । हृदय प्रेमका स्रोत है । उसमें प्रेम ही प्रेम भरा हुआ होता है । किन्तु अन्तःकरणकी अशुद्धियाँ हमें प्रेमके इस सागर पर्यन्त पहुँचनेमें बाधक बन जाती हैं । साधनाके द्वारा ये बाधायें दूर हो जाती हैं तब हम स्वयंको हृदयमें पायेंगे अर्थात् हमारा अपना(आत्माका) निवासस्थान हृदयको पाएँगे । हृदयको आनन्दमय कोष भी कहा गया है । आत्माकी उपस्थितिके कारण ही हृदयमें प्रेम भरा हुआ होता है । प्रेमका मूल स्रोत तो पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं । हम उनके आनन्द अंग होनेसे हमारा स्वरूप भी प्रेमका ही है । नश्वर शरीरके हृदयमें रहनेके कारण हमारी उपस्थितिसे हृदय प्रेमसे परिपूर्ण हो जाता है । जब हम देहभावसे ऊपर उठकर आत्मभावका अनुभव करने लेगेंगे तब हमें अपनी वास्तविक स्थितिका पता चलने लगेगा । इसीको दिलकी साधना कहा गया है । जिस प्रकार यह हृदय आत्माका स्थान है उसी प्रकार यह परमात्माका भी स्थान है । परमात्मा स्वरूप भी इसीमें अंकित होता है।


महामति श्री प्राणनाथजीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम कहा है और ब्रह्मात्माओंको धामहृदया कहा है । इसका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मात्माएँ अपने हृदयमें अपने धनी पूर्णब्रह्म परमात्माका स्वरूप अंकित करती हैं । वे सदैव अपने धनीके सान्निध्यका अनुभव करती हैं । उनके हृदयमें ही धामधनीका वास रहता है ।


साधनाका मुख्य उद्देश्य हृदयको धाम बनाना है । यह प्रेमसे ही सम्भव है । परमात्माके प्रति अतिशय प्रेमको भक्ति कहा गया है । भक्ति और प्रेममें तात्त्विक अन्तर नहीं है । प्रेम साधना और भक्तिसाधनाको एक ही माना है । जिसके हृदयमें परमात्माका वास होता है उसी भक्तने अपनी साधनाका यथार्थ फल प्राप्त किया ऐसा माना जाता है । इसलिए हम बाह्य साधनाकी अपेक्षा भक्ति साधना या प्रेमसाधनाकी ओर अधिक ध्यान दें और अपने हृदयमें परमात्माके स्वरूपको अंकित कर इसे परमधाम बनायें ।